व्यक्ति की सृष्टि संबंधी अवधारणा अक्सर उसकी दृष्टि से प्रभावित होती है। जिसकी दृष्टि जितनी व्यापक है, उसके लिए सृष्टि की अवधारणा भी उतनी ही व्यापक है। कोई सृष्टि को प्रकृति और पृथ्वी से आगे बढ़कर देख ही नहीं पाता और कोई ब्रह्मांड से भी आगे सृष्टि के विस्तार को जानने में लग जाता है।

हर रचना सृष्टि ही है। विश्व अगर ईश्वर की सृष्टि है तो कविता मानव मन की सृष्टि। प्राचीन योगियों का कहना है कि ’शून्यता में सुशुप्त शक्ति अपने स्वभाव गुण के चलते जागृत होकर गोलाकार जगत की सृष्टि करती है।’

  1.  योगियों द्वारा वर्णित शून्यता में सुशुप्त शक्ति की तुलना ब्लैक होल से की जा सकती है।
    वैज्ञानिक निकोडेम पोपलवस्की का मानना है कि ’सृष्टि की रचना ब्लैक होल से हुई है।’
  2. वैज्ञानिक भाषा में ’ब्लैक होल अंतरिक्ष का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ गुरुत्वाकर्षण शक्ति इतनी तेज होती है कि प्रकाश भी उस क्षेत्र से बाहर नहीं निकल पाता।’
  3.  ब्लैक होल दिखाई नहीं देता क्योंकि इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति (gravitational force) प्रकाश को अपने केन्द्र की ओर खींच लेती है। ’अगर कोई तारा किसी मध्यबिंदु को केन्द्र में रखकर घूमता दिखाई देता है तभी वैज्ञानिक तारे की गति का अध्ययन करके पता लगा सकते हैं कि वह ब्लैक होल की परिक्रमा कर रहा है।’
  4.  इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि ब्लैक होल वह शून्य है, जो दिखाई नहीं देता पर उसके भीतर शक्ति का गोलाकार प्रवाह मौजूद रहता है। समय के किसी एक बिंदु पर गोलाकार रूप में प्रवाहमान यह शक्ति ’ब्लैक होल’ से बाहर निकलकर सृष्टि की रचना करती है। तभी हर तारकमंडल (Galaxy) के केन्द्र में एक ’ब्लैक होल’ होता है। आकाश गंगा (Milky way) के केन्द्र में स्थित ’ब्लैक होल’ को ’सैगिटेरियस’ के नाम से जाना जाता है।
  5.  आम तौर पर इस शब्द का प्रयोग धनुराशि के लिए किया जाता है। सृष्टि के नियम पर गौर करें तो एक बात स्पष्ट होती है कि किसी भी रचना के लिए शून्यता में शक्ति का स्थापित होना जरूरी है। वैज्ञानिक भाषा में कहे तो ’ब्लैक होल’ का होना जरूरी है।
    मानव मन में भी रचना से पहले ’ब्लैक होल’ तैयार होता है। किसी बात या वस्तु के न होने का बोध शून्यता पैदा करती है। उस अभाव को मिटाने की इच्छा शक्ति ही शून्यता में शक्ति का बीज डालती है। फिर इंसान की सोच और चेष्टाएँ उस इच्छा को केन्द्र में रखकर उसके चारों ओर घूमने लगती हैं। यही इच्छा सपने का रूप लेकर शक्ति के प्रवाह को और बढ़ा देती है। तभी समय के किसी एक बिंदु पर मानव की तमाम चेष्टाएँ ब्लैक होल से बाहर निकलकर एक नए हकीकत की सृष्टि करती है।
    इच्छाशक्ति के दम पर सपनों को हकीकत में बदलने की बात को ’ब्लैक होल’ से निकलने वाला ’हाकिंग विकिरण’ एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। ’सन् 1974 में स्टीफेन्स हॉकिंग ने पदार्थ विज्ञान के जगत को चौंका देने वाले इस सत्य का उद्घाटन किया कि ब्लैक होल के ताप में ’सब एटोमिक कण’ निर्मित और निसृत करने की संभावनाएं हैं। जिसे आज ’हॉकिंग रेडिएशन’ के नाम से जाना जाता है।’
  6.  सन् 1972 से इस्राइल के पदार्थ वैज्ञानिक जेकोब बेकेंसटेन ने ब्लैक होल की एक सुनिश्चित ’एनट्रेपी’ होने की बात सामने रखकर ब्लैक होल के तापगतिविज्ञान (Thermodynamics) को और उससे निकलने वाली ऊर्जा को समझने की कोशिश शुरू की। सन् 1974 में हॉकिंग ने ऐसा ’सैद्धान्तिक मॉडल पेश किया जो यह दर्शाता है कि ब्लैक होल ’ब्लैक बॉडी रेडियेशन’ किस प्रकार छोड़ सकता है।’
  7.  ’एन्ट्रोपी’ की अवधारणा पर एक नज़र डालना जरूरी है :-
    ’एन्ट्रोपी किसी व्यवस्था की उस तापीय ऊर्जा के एक इकाई ताप का माप है, जो किसी उपयोगी कार्य को सम्पन्न करने के लिए उपलब्ध नहीं हो पाती। क्योंकि कार्य क्रमबद्ध आणविक गति से ही सम्पन्न हो पाता है। एन्ट्रोपी किसी व्यवस्था की आणविक क्रमबद्धता की कमी को सूचित करता है। जर्मन पदार्थ वैज्ञानिक रुडोल्फ क्लेसियस ने सन 1850 में इस अवधारणा को प्रकाशित करके 19वीं सदी के विज्ञान को महत्वपूर्ण मोड़ दिया।’
  8.  एन्ट्रोपी का संबंध तापगति विज्ञान (Thermodynamics) से है। यह पदार्थ विज्ञान की वह शाखा है जो ताप एवं ऊर्जा के रूप के संबंध के अध्ययन से जुड़ी है। ’निश्चित तत्व या स्पेस जो तापगतिक अध्ययन या विश्लेषण का विषय है वही व्यवस्था है।’
  9.  यहाँ व्यवस्था शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया गया है।
    मानव अपने परिवेश से निरंतर तत्व और ऊर्जा का विनिमय करता रहता है। इस लिहाज से देखें तो मानव शरीर को तापगतिक व्यवस्था (Thermodynamic System) के रूप में देखा जा सकता है। मानव की इच्छाशक्ति उसमें ब्लैक होल जैसा क्वांटम प्रभाव पैदा कर सकती है। क्वांटम से तात्पर्य है किसी भौतिक वस्तु की लघुतम और अलग मात्रा जो उसकी अंतरिक व्यवस्था में पाई जाती है। दरअसल मानव की इच्छाशक्ति सोच और चेष्टाओं की ऊर्जा मानव मन में ब्लैक होल पैदा कर सकती है। ब्लैक बोल की गुरुत्वाकर्षण शक्ति जैसे ऊर्जा को बाहर नहीं निकलने देती, उसी तरह मनुष्य की इच्छाशक्ति भी उसके ध्यान को एक जगह खींचकर रखते हुए उसके विचारों और चिंतन पद्धति में स्वाभाविक परिवर्तन लाती है। यह शक्ति मानव मन को बाहरी प्रभावों से बचाते हुए उसे इच्छा पर ध्यान केन्द्रित करके नई हकीकत पैदा करने वाले राहों को तलाशने के लिए प्रेरित करती है। मानव मन की इस स्थिति को वैज्ञानिक भाषा में एकाकी व्यवस्था (Isolated system) कहा जा सकता है।
    ’प्रकृति विज्ञान में एकाकी व्यवस्था को एक ऐसी भौतिक व्यवस्था कहा गया है जो बाहर से कोई विनिमय नहीं करता – कोई तत्व या ऊर्जा यहाँ न प्रवेश कर सकती है न बाहर निकल सकती है। यह वस्तु और ऊर्जा केवल भीतर ही चक्कर लगाती है।’
  10.  ’तापगतिक विज्ञान के द्वितीय सिद्धांत के अनुसार एकाकी व्यवस्था के रूप में पूरे ब्रह्मांड की एन्ट्रोपी वक्त के साथ हमेशा बढ़ती ही रहेगी। यह सिद्धांत यह भी बताता है कि ब्रह्मांड की एन्ट्रोपी का यह परिवर्तन कभी नकारात्मक नहीं होगा।’
  11. अगर इच्छाशक्ति मानव मन को एकाकी व्यवस्था में परिणत कर सकती है तब मानव मन में चलने वाली प्रक्रिया का संबंध निश्चित रूप से ब्रह्मांड में चलने वाली प्रक्रिया से जोड़ा जा सकता है।
    निकोडेम पोपलवस्की का कथन है ’क्योंकि ऊर्जा भार में परिणत हो सकती है और अत्यंत तीव्र गुरुत्वाकर्षण की अवस्था में भारी तादाद में कण निर्मित होते हैं, जो ब्लैक होल के भार को भीतर से बढ़ा देते हैं। जब वृत्ताकार घूमते हुए कणों की बढ़ती संख्या अंतरिक्ष एवं काल पर गहरा असर डालते हैं तब ब्लैक होल से एक शिशु ब्रह्मांड की सृष्टि होती है।’
  12.  ब्रह्मांड की हर चीज़ कणों से बनी है और जिस न्याय से ऊर्जा से कणों का जन्म होता है उसी न्याय से इच्छाशक्ति से नई हकीकत का जन्म लेना भी संभव है। इंसान का विद्युत चुंबकीय क्षेत्र (Electromagnetic field) और उसकी सोच की शक्ति से निकलने वाले कण ये साबित करते हैं कि वह कुदरत की एक ऐसी सृष्टि है जो अपने भीतर ब्लैक होल पैदा करके किसी भी नई बात या वस्तु की सृष्टि कर सकता है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक तारकमंडल (Galaxy) के भीतर स्थित एक ब्लैक होल में एक नए तारकमंडल को जन्म देने की ताकत दबी होती है।
    इंसान के भीतर सही इच्छाशक्ति का बीज ज्ञान के जरिए ही बोया जा सकता है। जीवनमुखी नजरिए से विज्ञान की शिक्षा नई पीढ़ी में संभावनापूर्ण ब्लैक होल तैयार कर सकती है। इसके लिए विज्ञान से आत्मतत्व को जोड़ना जरूरी है। ब्रह्मांड के साथ आत्मतत्व के संबंध को वैज्ञानिक नजरिए से देखना जरूरी है। पदार्थ पर प्रयोग करके दिखाई देने वाले प्रभाव आखिरकार अंकों में ढ़लकर जीवन से कट जाते हैं। उसे जीवन से जोड़ने के लिए ब्रह्मांड तक का सफर तय करना होगा। व्यक्त और अव्यक्त, दृश्य और अदृश्य के बीच की राह को नए और उदारतावादी विज्ञान के नजरिए से खोजना होगा।

संदर्भ
1. Nigurananda, Divyajagat O Dwaibi Bhasha, Karuna Prakashani, Kolkata, Page no. 16
2. https://www.insidescience.org/news/every-black-hole-contains-new-universe
3. https://www.nasa.gov/audience/forstudents/5-8/features/nasa-knows/what-is-a-black-hole-58.html
4 https://www.nasa.gov/audience/forstudents/5-8/features/nasa-knows/what-is-a-black-hole-58.html
5. https://www.nasa.gov/audience/forstudents/5-8/features/nasa-knows/what-is-a-black-hole-58.html
6. http://www.physicsoftheuniverse.com/topics_blackholes_theory.html
7. https://www.thoughtco.com/what-is-hawking-radiation-2698856
8. https://www.britannica.com/science/entropy-physics
9 . http://www.brighthubengineering.com/thermodynamics/3733-what-is-a-thermodynamic-system/
10. https://www.physicsforums.com/threads/what-is-an-isolated-system.700344/
11.https://chem.libretexts.org/Core/Physical_and_Theoretical_Chemistry/Thermodynamics/Laws_of_Thermodynamics/Second_Law_of_Thermodynamics
12. https://www.insidescience.org/news/every-black-hole-contains-new-universe