हजार कामों के बीच उलझी जिन्दगी में मन अपने लिए कुछ पल मांगता है। ऐसे पल जो हर तनाव से मुक्त हो । विशाखापट्टनम, अराकू और त्याडा में बिताए कुछ ऐसे ही पलों को मेरा मन भुलाए नहीं भूल सकता। इस सफर पर जाने की बात पक्की होते ही मन विशाखापट्टनम के सागर और अराकू की वादियों का नजारा देखने के लिए मचलने लगा था।

रेल से लगभग चौदह घंटे का सफर तय करके हम विशाखापट्टनम पहुँचे। स्टेशन से होटल जाते हुए आंध्र प्रदेश में बसे इस शहर के साफ-सुथरे चौड़े रास्तों ने हमारा ध्यान खींचा। पर सच पूछिए तो विशाखापट्टनम में पैर रखते ही मेरी आँखें सागर की ऊँची-ऊँची लहरों को देखने के लिए बेताब हो रही थीं। होटल पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई। इसलिए आँखों को शाम तक इन्तजार करना पड़ा। बेचैन निगाहों ने विशाखापट्टनम के रामकृष्ण समुद्र तट पर पहुँचकर लहरों के बनने और किनारों से टकराकर टूटने का खेल देखा। सागर की लहरों का शोर कानों में गूंज रहा था। सागर का यह किनारा पर्यटकों को आसानी से लहरों से खेलने की इजाजत नहीं देता। सागर के किनारे सीपियों से बने सामानों की छोटी-छोटी दुकानें थीं सागर तट पर सैर करने आए लोगों से टोकरी में रखे गजरों को खरीदने का आग्रह करने वाली लड़कियाँ मानो पर्यटकों से दक्षिण भारत के रंग में रंगने का आमंत्रण दे रही थीं। धीरे-धीरे सागर पर काली चादर फैलने लगी। समुद्र तट के समानान्तर दूर तक चली गई। चौड़ी सड़क के किनारे लगी बत्तियाँ अंधेरा होने के साथ ही जल उठीं। क्रमबद्ध ढंग से लगी बत्तियों के सौंदर्य ने सड़क के किनारे बसी ऊँची-ऊँची इमारतों की बत्तियों से मिलकर एक आलीशान नजारा तैयार कर दिया। सागर के किनारे बसी छोटी-छोटी दुकानों की टिमटिमाती बत्तियों का आकर्षण अंधेरे में चमकते जुगनुओं जैसा था। झिलमिल रोशनी के बीच लहरों की आवाज मन की गहराइयों में उतर रही थी अंधेरा गहराने के साथ हमें रास्तों के सुनसान होते जाने का एहसास हुआ और हम होटल की ओर चल दिए।

नाश्ते पर दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध व्यंजन डोसा का सेवन करके हम अगले दिन सुबह आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग के ‘हेरीटेज टुअर’ पर रवाना हुए। ‘हेरीटेज’ के लिए हिन्दी शब्द है ‘विरासत’। यह सफर पर्यटकों को विशाखापट्टनम की विरासत की पहचान करवाता है। इस सफर में नए साथी मिले। शहर के शोरगुल को पीछे छोड़ते हुए हमारी बस पहाड़ी रास्तों से गुजरने लगी। हम सिम्हाचलम मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। वेंकटेश्वर का यह मंदिर बहुत प्राचीन माना जाता है। मंदिर की दीवारों की नक्काशी देखने लायक है। दीवार के काले पत्थरों पर उभरी देवी-देवताओं के अलग-अलग रूपों की झांकी में आँखें स्वाभाविक ढंग से खोने लगती हैं। मंदिर के भीतर विभाजक के तौर पर लगाई गई छड़ों को देखकर मंदिर में होने वाली दर्शनार्थियों की भीड़ का अंदाजा लगाया जा सकता है। मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुँचने की सीढ़ियाँ रंग-बिरंगी हैं। यह रंगों का वैभव दर्शकों का ध्यान खींचता है। सिम्हाचलम मंदिर को दक्षिण भारत की वास्तुकला का एक सुन्दर नमूना कहा जा सकता है।

हमारा अगला मुकाम था कैलाश गिरि इस मुकाम तक पहुँचने के लिए हमारी बस पहाड़ी रास्तों पर चलने लगी। पहाड़ की सर्पीली राहों से गुजरने का एक अलग मजा था। कुछ ऊँचाई पर पहुँचकर पीछे छूटे हुए रास्ते दिख रहे थे, जो हमें ऊँचाई पर होने का एहसास दिला रहे थे। पहाड़ के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते हुए हम कैलाश गिरि पहुँच गए। यहाँ शिव- पार्वती की विशाल श्वेत युगल मूर्ति ने आँखों में दूधिया उजाला भर दिया। कैलाश गिरि से पूरे विशाखापट्टनम शहर का नजारा देखना एक और यादगार घटना है। ऊंचे पहाड़ पर खड़े होकर सागर का नजारा देख पाने के एहसास को शब्दों में बयान करना मुश्किल है। पहाड़ के पैरों को धोता सागर और सागर के तटवर्ती इलाकों में खड़ी इमारतों का नजारा हमें किसी स्वप्नलोक में होने का एहसास दिला रहा था। इस पल को हमने कैमरे में बांधने की कोशिश की। पर इस बात का एहसास हमें लगातार होता रहा कि आँखों से बेहतर कैमरा आज तक बना ही नहीं उस जगह की शांति, शीतल हवा से वहाँ के नजारे में घुले रंग को कैमरे में कैद कर पाना मुश्किल है। यह रंग सिर्फ एहसास में जिन्दा रह सकता है। रंग-बिरंगे फूलों की बागवानी और तरह-तरह के झूलों को देखकर यहाँ कुछ वक्त गुजारने का लोभ हुआ। कैलाश गिरि में हमारी आँख रंग-बिरंगे फूलों से सजे बाग के बीच स्थित एक छोटे से ‘रोप वे’ स्टेशन पर पड़ी। यह रोप-वे ऊँची पहाड़ी से सीधे सागर के तट तक जाता है। समय की कमी के कारण हमें ऊँची पहाड़ी से सागर तक पहुँचने के रोमांचक सफर का मोह त्यागना पड़ा।

हिंसा से जलते जीवों के लिए बुद्ध बौद्ध धर्म के रूप में संजीवनी लेकर आए थे। बौद्ध धर्म के अनुयायियों के पावन कदमों की छाप यहाँ भी पड़ी। उनके शुभ कदमों ने इस शहर को एक छोटा सा ऐसा तालाब दिया, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका पानी आज तक कभी सूखा ही नहीं प्यासों को कभी न मायूस करने वाले इस तालाब को संजीवनी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। कइयों ने इसे महान शक्ति का वरदान कहा तो कइयों ने विज्ञान की पहेली। पर हकीकत का खास पहलू यह है कि यह तालाब इस शहर की अमानत है। इसे देखकर हमें आंध्र प्रदेश की विरासत का एहसास हुआ।

सूरज सिर पर आ गया था। हम ऋषिकोंडा समुद्र तट पर बने आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग के रिसोर्ट की ओर रवाना हुए ऋषिकोंडा समुद्र तट पर बना यह रिसोर्ट एक शब्द में कहें तो आलीशान है। शहर के शोरगुल से दूर ऊँची पहाड़ी पर बना यह रिसोर्ट आदमी के मन और मस्तिष्क को ठंडक पहुँचाता है। यहाँ हमने सागर को पहाड़ के चरण भिगोते हुए देखा। इस तट पर सागर की लहरें रामकृष्ण समुद्र तट की तरह अशांत नहीं हैं। आदमी यहाँ सागर की लहरों से खेलने का आनंद उठा सकता है। पहाड़ और सागर को एक साथ देखते हुए आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग की मेजबानी में दक्षिण भारत के लहजे में बने शुद्ध शाकाहारी भोजन का एक अलग ही मजा था।

विशाखापट्टनम के पनडुब्बी संग्रहालय को देखना एक और यादगार मंजर था। यहाँ संग्रहालय के रूप में रखी पनडुब्बी कभी पानी के नीचे हुआ करती थी। बाद में इसे पर्यटकों के दर्शनार्थ सागर के किनारे रखा गया। पनडुब्बी के भीतर की जटिल संरचना को उस दिन पहली बार करीब से देखने का मौका मिला। छोटे-छोटे केबिनों में महीनों तत्पर भाव से देश की रक्षा में जुटे रहने के लिए कितने आत्मबल की जरूरत होती है इसका एहसास हमें पनडुब्बी के भीतर के जटिल मशीनी तंत्र ने दिलाया। मत्स्य बंदरगाह से तेलुगू संगीत से गूंजते जहाज में बैठकर सागर की गोद में झूलने के एहसास के साथ ‘हेरिटेज सफर’ खत्म हुआ।

अब सागर को अलविदा कहकर अराकू घाटी की ओर बढ़ने का समय आ गया था। अराकू घाटी को वहाँ के लोग सपनों की घाटी कहते हैं। विशाखापट्टनम से सपनों की घाटी तक का यह सफर रोमांचक था पर्यटकों का अनुभव कहता है कि इस सफर को यदि बस की तुलना में रेल से तय किया जाए तो वह स्मृति में स्वर्णाक्षरों की तरह चमकता रहता है। पूरे दिन में केवल एक ही ट्रेन ‘किरनडल एक्सप्रेस’ अराकू घाटी तक जाने की राह से गुजरती है। आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग के खुशमिजाज़ लोगों की मेहमाननवाजी में विशाखपट्टनम स्टेशन से हमने सपनों की घाटी अराकू तक पहुँचने का सफर शुरू किया। रेल छूटने के तकरीबन आधे घंटे बाद से ही धीरे-धीरे पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ने का खूबसूरत एहसास मन को छूने लगा। पहाड़ के सर्पीले रास्तों पर बिछी पटरी पर रेल आगे बढ़ रही थी और खिड़की की एक ओर से दिखाई देने वाली खाई गहराती जा रही थी। ब्रिज पर से रेल को गुजरते हुए देखना एक सुंदर अनुभव था। अंग्रेजी के ‘सी’ (C) अक्षर-सी राह के ठीक बीचोंबीच बने ब्रिज से जब हमारी रेल गुजरी तो खिड़की से रेल के दोनों सिरे दिखाई दे रहे थे। यह नजारा बचपन में आर्ट बुक के पन्ने पर देखी रेल की तसवीर की याद को ताजा कर रहा था। खाई के उस पार पहाड़ की ढलानों पर कहीं जंगली पेड़ दिखाई दे रहे थे तो कहीं सीढ़ीदार खेत साथ ही कहीं मिट्टी के खिसक जाने से पहाड़ की सूनी गोद भी दिखाई दे रही थी पर कुल मिलाकर पहाड़ों पर हरियाली ने ही अपना आधिपत्य जमा रखा था। इस हरियाली के बीच से गुजरते हुए पहाड़ी गांव का नजारा देखना एक रोमांचक अनुभव था ।

तकरीबन चार घंटे का सफर तय करने के बाद पहाड़ की चोटियां हमारे काफी करीब नजर आने लगीं। सूचना मिली कि हम अराकू स्टेशन के करीब हैं। रेल से पहाड़ों का नजारा देखने के बाद हमने बस से सपनों की घाटी अराकू का नजारा देखने का सफर शुरू किया। अराकू घाटी की सैर कराते हुए हमारी बस यात्री निवास पहुँची। यहाँ आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग के सौजन्य से हमें दक्षिण भारत के लहजे में बने शुद्ध शाकाहारी भोजन और अराकू के आदिवासियों का ‘डिमसा’ नृत्य देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। डिमसा नृत्य में नृत्यांगनाओं के पेरों का एक कतार में ताल से थिरकना देखने लायक था। इस नृत्य के लिए गीत के बोल की जरूरत नहीं होती। ढोल, नगाड़ों की ताल पर नृत्यांगनाओं के कदम थिरकते हैं। नृत्य करते हुए औरतें कभी-कभी एक साथ उल्लास के इजहार सी प्रतीत होने वाली ध्वनि निकालती हैं। इस नृत्य में सामूहिक तालमेल देखने लायक है। डिमसा नृत्य के दृश्य को यादों की गठरी में बांधकर हम वोरा की गुफाओं की ओर रवाना हुए।

वोरा की गुफाओं का नजारा इस सफर का एक बहुत बड़ा तोहफा है चूना पत्थर में पानी के रिसने से बनी विभिन्न आकृतियाँ वोरा की गुफाओं को आकर्षक बनाए हुए हैं। गुफा के मुँह से ही इसके भीतर तक चली गई अनगिनत सीढ़ियों का दृश्य दिखाई दे जाता है। कल्पनाशील मन को इस गुफा में अनगिनत आकृतियां दिखाई दे सकती हैं। गुफा में बनी आकृतियों को देखने के लिए रोशनी का प्रबंध कुछ इस तरह से था कि आदमी में गुफा में होने का एहसास जिन्दा रहे। सीढ़ियों पर चलते हुए एक ओर मेरी आँखें गुफा की विशालता और इसके भीतर की अनगिनत आकृतियों को निरख रही थीं तो दूसरी ओर गुफा के भीतर की शीतलता मन को कहीं गहरे छूती जा रही थी। इसी एहसास को मन में संजोकर हम अनंतगिरि में स्थित आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग के रेस्तरां में पहुँचे।

हम अपने सफर के अंतिम मुकाम पर थे। हमारा अगला पड़ाव था ‘जंगल बेल्स’। त्याडा में स्थित ‘जंगल बेल्स’ आंध्र प्रदेश सरकार की एक अनोखी परियोजना है। इसे उन्होंने ‘ईको फ्रेंडली’ परियोजना नाम दिया है। अकृत्रिमता का संरक्षण इस परियोजना के मूल उद्देश्यों में से एक है। तभी यहाँ न टेलीफोन लाइन है और न ही किसी यंत्र के जरिए संगीत सुनने का प्रबंध है। यहाँ सिर्फ प्रकृति का संगीत गूंजता है सुबह चिड़ियों का कलरव और रात को झींगुरों का स्वर शायद इसीलिए इस जगह का नाम ‘जंगल बेल्स’ है आदमी यहाँ घने जंगल के बीच वक्त गुजारने का रोमांच महसूस कर सकता है।

अराकू से रवाना हुई पर्यटन विभाग की बस को बीच में ही छोड़कर हम जंगल की घंटियों की धुन में रमने के लिए ‘जंगल बेल्स’ उतरे। रात के अंधेरे में ‘जंगल बेल्स’ के पेड़ों के बीच लगी हरी रोशनी आँखों को लुभा रही थी। यहाँ भी हमें आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग का दोस्ताना हाथ बढ़ा हुआ मिला। पहाड़ की ढलान पर जंगल के बीच थोड़ी ऊँचाई पर लकड़ी के कॉटेज बने हुए थे। कॉटेजों के बीच की दूरियाँ नपी-तुली थीं यह दूरी किसी कॉटेज के व्यक्ति को किसी का पड़ोसी होने के बजाय जंगल के बीच होने का एहसास दिलाती थी यहाँ हर कॉटेज को एक-एक चिड़िया का नाम दिया गया है। हमारा कॉटेज थोड़ी ऊँचाई पर था। रात के अँधेरे में टॉर्च की रोशनी में सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हम अपने कॉटेज तक पहुँचे। कॉटेज की बड़ी-बड़ी काँच की खिड़कियाँ अँधेरे में डूबे जंगल में होने के एहसास को और तीव्र कर रही थीं। ‘जंगल बेल्स’ पहुँचते ही डिमसा नृत्य का आनंद उठाने के लिए वहाँ के रेस्तरां में आने का आमंत्रण मिला। एक बार फिर मन को डिमसा नृत्य की ताल पर थिरकने का मौका मिला। चारों ओर से खुले गोलाकार रेस्तरां के ठीक बगल में बरगद के पेड़ के नीचे एक  गोलाकार ऊँची जगह थी। यही डिमसा नृत्य पेश करने वाली नृत्यांगनाओं का मंच था। बरगद के पेड़ की शाखाएं एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक चली गई थीं। इस पेड़ की शाखाओं का यह विस्तार इसके काफी पुराने होने का एहसास दिला रहा था। जंगल बेल्स का रेस्तरां हो या कॉटेज या फिर यहाँ की सीढ़ियां, कुछ भी जंगल के सौंदर्य को दांव पर लगाकर नहीं बनी, बल्कि ये सभी जंगल का हिस्सा बनकर जंगल की शोभा को बढ़ाते हैं और आदमीं को प्रकृति के करीब होने का एहसास दिलाते हैं।

जंगल बेल्स पहुँचते ही मन में आस-पास के इलाके को करीब से देखने की चाहत का बीज पड़ चुका था। अपनी यह हसरत पूरी करने के लिए हम सुबह-सुबह सैर को निकल पड़े। ‘जंगल बेल्स’ से थोड़ी दूरी पर छोटा-सा पहाड़ी स्टेशन ‘त्याडा’ एक घूमने लायक जगह थी। पतली गेज की पटरी के समानांतर चलते हुए हम सुबह-सुबह त्वाडा स्टेशन पहुँचे। यहाँ पहुँचते ही पहाड़ की गोद में बसे छोटे से स्टेशन को बहुत करीब से देखने की चाहत पूरी हो गई। प्लेटफॉर्म से थोड़ी ऊँचाई पर इस स्टेशन का नियंत्रण कक्ष था यहाँ से किसी सज्जन ने हमें ऊपर आने का निमंत्रण दिया। बांग्लाभाषी यह सज्जन यहाँ के स्टेशन मास्टर थे। पिछले कई सालों से वे त्याड़ा स्टेशन तक आने वाले ‘जंगल बेल्स’ के यात्रियों से त्याडा के अनुभवों को बांटते चले आ रहे थे। हसीन वादियों में रहने की खुशी और परिवार जनों से दूर रहने का गम दोनों ही उनकी आवाज में मुखरित था। हमें त्याडा की निर्जनता आकर्षित कर रही थी और यह सज्जन इस निर्जनता से नाखुश थे जो भी हो पर पहाड़ की गोद में मुट्ठी भर लोगों के साथ प्रेम से रहने का अहसास उनके लिए एक अनमोल तोहफा था, जो उनकी नजर में हजारों लोगों के बीच होते हुए भी अकेले होने के दर्द से सौगुना बेहतर था।

विशाखापट्टनम से त्याड़ा तक के सफर में हमने अपनी यादों की गठरी में कई अनमोल मोती चुन लिए। पहाड़ से हरियाली और सागर की लहरों से चंचलता चुराकर हम महानगर की रूखी-सूखी जमीन पर लौट रहे थे। इस सफर में देखे हुए खूबसूरत नजारे आँखों के कैमरे में कैद थे |